प्रभू जी तुम औगन बकसन हार। हऊं बहु नीच उधरों पातकी, मूर्ख निपट गंवार॥टेक॥ मो सम पतित अधम नहीं कोउ, शीन दुखी विसिआर। नाम सुनहि नरकु भजै है, तुम्ह् बिन कवन हमार॥ पतित पावन विरद तिहारौ, आई परौं तोहि दुवार। कहि रविदास इहु मन आसा, निज कर लेहु उबार॥