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पूजा
आत्मा का परमात्मा की तरफ कुदरती झुकाव है, जिसके कारण हर इनसान के अन्दर प्रभु से मिलने की तड़प है और हर इनसान किसी न किसी ढंग से उसकी पूजा या भक्ति करने की कोशिश करता है। सन्तों-महात्माओं का पूजा या भक्ति से एक ही भाव है। भक्त, पुजारी या उपासक भक्ति, पूजा या उपासना द्वारा अपने इष्ट की प्रसन्नता और उसकी प्राप्ति का प्रयत्न करता है।

संसार में अनेक प्रकार के इष्टों की अनेक प्रकार की पूजा या भक्ति की परम्परा प्राचीन काल से चली आ रही हैं। लोग प्रकृति की शक्तियों जैसे सूर्य देवता, वरुण देवता आदि की पूजा करते रहे हैं। देवी-देवताओं, अवतारों आदि की पूजा सदियों से चली आ रही है। कई लोग पशु-पक्षियों आदि की भी पूजा करते हैं। सन्तमत में एक प्रभु को छोड़कर दूसरी हर वस्तु को अपूर्ण और नाशवान माना गया है। इसलिये सब धर्मों में समय-समय पर हुए सब सन्तों- महात्माओं ने केवल उस एक निराकार, अविनाशी प्रभु की पूजा या भक्ति का उपदेश दिया है। कबीर साहिब कहते हैं,
'पूजहु रामु एक ही देवा'
(आदि ग्रन्थ, पृ. 484)
सन्त-महात्मा समझाते हैं कि जिस इष्ट की हम पूजा करते हैं, हम उसी को प्राप्त होते है। गुरु नानक देव जी कहते हैं,
'जैसा सेवै तैसो होइ॥ '
(आदि ग्रन्थ, पृ. 223)
भगवान कृष्ण ने भी गीता में उपदेश दिया है कि देवी-देवताओं की पूजा करनेवाले देवी-देवताओं को, जिन-भूतों की पूजा करनेवाले जिन-भूतों को और पारब्रह्म परमेश्वर की पूजा करनेवाले पारब्रह्म परमेश्वर को प्राप्त होते हैं (गीता 9:25)।

वह प्रभु सत्य है, वह शक्ति-रूप, ज्ञान-रूप, प्रेम-रूप और आनन्द-रूप है। केवल उस प्रभु की पूजा या भक्ति द्वारा ही जीवात्मा भी सत्य-रूप, शक्ति-रूप, ज्ञान-रूप, प्रेम-रूप और आनन्द-रूप बन सकती है। वह प्रभु अयोनि है यानी जन्म-मरण के बन्धनों से ऊपर है। बाक़ी सब इष्ट आवागमन के चक्कर से बँधे हुए है, इसलिये उनकी पूजा या भक्ति द्वारा कभी भी कोई भक्त या पुजारी जन्म- मरण के बन्धनों से मुक्त नहीं हो सकता।
सन्त-महात्मा समझाते हैं कि मनुष्य द्वारा बनाये गए पूजा या भक्ति के सब साधन और मार्ग बाहरमुखी हैं। परमात्मा द्वारा बनाया गया पूजा या भक्ति का मार्ग अन्तर्मुखी है। वे कहते हैं कि वह परमात्मा भी हमारे अन्दर है और उसकी पूजा या भक्ति का मार्ग भी हमारे अन्दर ही है। गुरु अर्जुन देव जी कहते हैं:

मारगु प्रभ का हरि कीआ संतन संगि जाता ॥
(आदि ग्रन्थ, पृ. 1122)
परमात्मा की पूजा या भक्ति का सच्चा साधन और मार्ग एक, अनादि और परिवर्तनरहित है। यह स्वयं परमात्मा द्वारा बनाया गया है। इसका ज्ञान अपनी आत्मा को परमात्मा में अभेद कर चुके पूर्ण सन्तों द्वारा होता है। केवल इस साधन और मार्ग को अपना कर ही इनसान प्रभु से मिलाप कर सकता है। सन्त-महात्मा परमात्मा द्वारा
निश्चित किये गए भक्ति के साधन और मार्ग को सन्तमत, गुरुमत, भक्ति मार्ग या प्रेमा-भक्ति मार्ग कहते हैं और बाक़ी हर प्रकार की भक्ति को मनमत कहते हैं। गुरु अमरदास जी कहते हैं:
पूजा करै सभु लोकु संतहु मनमुखि थाइ न पाई ॥
पूजा करहि परु बिधि नही जाणहि दूजै भाइ मलु लाई ॥
(आदि ग्रन्थ, पृ. 910)
पूजा या भक्ति तो परमात्मा की सब ही करते हैं, मगर वे
मनमर्जी की भक्ति करते हैं। सच्ची भक्ति का ज्ञान न होने
के कारण उन्हें भक्ति से लाभ होने की बजाय हानि होती है।
आप कहते हैं:
हरि साचे भावै सा पूजा होवै भाणा मनि वसाई ॥
(आदि ग्रन्थ, पृ. 910)
पूजा या भक्ति वही ठीक है जो परमात्मा को पसन्द है। इसलिये परमात्मा के भाणे या हुक्म को मानते हुए परमात्मा द्वारा ख़ुद निर्धारित की गई सच्ची पूजा या भक्ति में लगना चाहिये। आप कहते हैं:
बिनु नावै होर पूज न होवी भरमि भुली लोकाई ॥
सबदि मेरै मनु निरमलु संतहु एह पूजा थाइ पाई ॥
(आदि ग्रन्थ, पृ. 910)
केवल शब्द या नाम की कमाई ही वह सच्ची पूजा या भक्ति है जो प्रभु को पसन्द है और इसके द्वारा ही इनसान परमात्मा से मिलाप कर सकता है। आप चेतावनी देते हैं कि शब्द या नाम की कमाई को छोड़कर हम परमात्मा की पूजा या भक्ति का जो भी साधन और मार्ग अपनाते हैं, वह हमें चौरासी के चक्कर से बाँधकर रखता है और ऐसे मनमर्जी के साधनों द्वारा हम कभी भी परमात्मा से मिलाप नहीं कर सकते।
सन्त-महात्मा सावधान करते हैं कि जप-तप, तीर्थ-व्रत, पुण्य-दान, अनेक प्रकार के हठ-कर्मों आदि का फल अवश्य मिलता है, लेकिन पूजा या भक्ति के ये साधन परमात्मा से मिलाप का कारण नहीं बन सकते। गुरु नानक देव जी कहते हैं:
सगले करम धरम सुचि संजम जप तप तीरथ सबदि वसे ॥
(आदि ग्रन्थ, पृ. 1332)
आप समझाते हैं कि हर प्रकार के श्रेष्ठ कर्मों, हर प्रकार के धार्मिक प्रयत्नों, मन-इन्द्रियों की सफ़ाई के लिये अपनाये जाने वाले अनेक प्रकार के संयम तथा हर प्रकार के तीर्थ, जप, तप आदि का फल नाम की कमाई में शामिल है। आप कहते हैं:
पूजा कीचै नामु धिआईऐ बिनु नावै पूज न होइ ॥
(आदि ग्रन्थ, पृ. 489)
अपना ध्यान नाम से जोड़ना प्रभु की सच्ची पूजा है। इसके अलावा कोई अन्य पूजा या भक्ति प्रभु से मिलाप का साधन नहीं बन सकती।

कुछ लोग हठ-मार्ग का प्रचार करते हैं, तो कुछ कर्म-मार्ग और ज्ञान मार्ग का। कुछ लोग त्याग पर बल देते हैं, तो कुछ भक्ति के अन्य कष्टदायक बाहरी साधनों का प्रचार करते हैं। ये साधन और मार्ग जन-साधारण के वश की बात नहीं हैं। वह प्रभु परम दयालु है। उसने अपनी प्राप्ति के लिये अपनी पूजा का सबसे सुगम, स्वाभाविक और सहज मार्ग बनाया है।
वह मार्ग शब्द या नाम है। नाम हर व्यक्ति के अन्तर में है। यह हर व्यक्ति के निकट से निकट है। इसकी प्राप्ति के लिये किसी प्रकार के बाहरी प्रयत्न की जरूरत नहीं, केवल ध्यान को अन्तर्मुख करने की जरूरत है। नाम से सन्तों-महात्माओं का भाव किसी विशेष भाषा का कोई लफ़्ज़ नहीं है। नाम से उनका भाव वह सच्चा शब्द है, जिसने सृष्टि की रचना की है और जो हर व्यक्ति की आँखों के पीछे और मध्य दिन- रात धुनकारें दे रहा है।

गुरु नानक साहिब कहते हैं:
देही अंदरि नामु निवासी ॥ आपे करता है अबिनासी ॥
(आदि ग्रन्थ, पृ. 1026)
घरि घरि नामु निरंजना सो ठाकुरु मेरा ॥
(आदि ग्रन्थ, पृ. 229)
देही के अन्दर स्थित नाम ही सच्चा कर्ता या निरंजन है और वही सच्चा ठाकुर या इष्ट है। आप समझाना चाहते हैं कि नाम ही पूजा है और नाम ही पूज्य है। नाम परमात्मा का रूप है और नाम से लिव जोड़ना स्वयं परमात्मा से लिव जोड़ना है। इसलिये अपने मन को हर प्रकार के दूसरे साधनों से निकालकर केवल नाम या शब्द की पूजा द्वारा परमात्मा की प्राप्ति का यत्न करना चाहिये।
वाणी
1. पाँच तत्त नर आतम देही। एक तत्त पाहन को सेई ॥
पाहन को तुम सुद्ध बतावौ। चेतन को धरि दोष लगावौ ॥
(तुलसी साहिब, घट रामायण, भाग 2, पृ. 66)
2. आतम तेजि पूजे जड़ पाहन प्रेम सो मूरति है घट माहीं।
बेद विचारि आचारि चतुरदिश खोजत है ईहई सब आहीं ॥
(दरिया, हस्तलिखित ग्रन्थ, पृ. 20)
3. एकै पाथर कीजै भाउ ॥ दूजै पाथर धरीऐ पाउ ॥
जे ओहु देउ त ओहु भी देवा ॥ कहि नामदेउ हम हरि की सेवा॥
सन्त नामदेव (आदि ग्रन्थ, पृ. 525)
4. घर में जिंदा छोड़ि कै मुरदा पूजन जायँ ॥
मुरदा पूजन जायँ भीति को सिरदा नावें।
पान फूल और खाँड़ जाइ कै तुरत चढ़ावैं ॥
ताल कि माटी आनि ऊँच कै बाँधिनि चौरी।
लीपि पोति के धरिनि पूरी औ बरा कचौरी ॥
पीयर लूगा पहिरि जाइ कै बैठिनि बूढ़ा।
भरमि भरमि अभुवाइँ माँगत हैं खसी कै मूँड़ा ॥
पलटू सब घर बाँटि कै लै लै बैठे खायें।
घर में जिंदा छोड़ि कै मुरदा पूजन जायँ ॥
(पलटू साहिब की बानी, भाग 1, कुण्डली 190)
5. पाती तोरै मालिनी पाती पाती जीउ।
जिसु पाहन कर पाती तौरै सो पाहन निरजीउ।
भूली मालनी है एउ। सतिगुरु जागता है देउ।
ब्रहमु पाती बिसनु डारी फूल संकरदेउ।
तीनि देव प्रतखि तोरहि करहि किस की सेउ।
कबीर साहिब (आदि ग्रन्थ, पृ. 479)
6.बाहर मुरति पथल का रचिया ता पर पाती दीना।
सजीव तोरि निरजीव के पूजा जबर से भए अधीना।
महिखा मारि देवल को भीतर पर आतम कहे भीना।
जीव सीव एह राम सभनि में भान कला छबि दीना।
(दरिया ग्रन्थावली, भाग 1, पृ. 102)
7. आनीले फूल परोईले माला ठाकुर की हउ पूज करउ ॥
पहिले बासु लई है भवरह बीठल भैला काइ करउ ॥
आनीले दूधु रीधाईले खीरं ठाकुर कउ नैवेदु करउ ॥
पहिले दूधु बिटारिओ बछरै बीठलु भैला काइ करउ ॥
- सन्त नामदेव (आदि ग्रन्थ, पृ. 485)
8. माटी के करि देवी देवा तिसु आगै जीउ देही ॥
ऐसे पितर तुमारे कहीअहि आपन कहिआ न लेही ॥
सरजीउ काटहि निरजीउ पूजहि अंत काल कउ भारी ॥
राम नाम की गति नही जानी भै डूबे संसारी ॥
कबीर साहिब (आदि ग्रन्थ, पृ. 332)
9. कहा करूं जग देखत अंधा। तजि आनंद बिचारै धंधा ॥
पाहन आगै देव कटीला। बाको प्रांण नहीं बाकी पूज रचीला ॥
निरजीव आगै सरजीव मारें। देखत जनम अपनौ हारें ॥
आंगणि देव पिछोकडि पूजा। पाहन पूजि भए नर दूजा ॥
नांमदेव कहै सुनौ रे धगड़ा। आतमदेव न पूजौ दगड़ा ॥
(नामदेव, हिन्दी पदावली, पद-47)
10. ना कछु बोले ना कछु खाई। कहु तेहि पूजे का मिले भाई॥
(दरिया सागर, पृ. 46)
11.पाहन पूजे हरि मिलै, तौ मैं पूजूँ पहार।
ता तें यह चाकी भली, पीसि खाय संसार ॥
(कबीर साखी-संग्रह, पृ. 165)
12. राज ते कीट कीट ते सुरपति करि दोख जठर कउ भरते ॥
क्रिपा निधि छोडि आन कउ पूजहि आतम घाती हरते ॥
(गुरु अर्जुन देव (आदि ग्रन्थ, पृ. 1267)
13. कर कर परसाद भोग ठाकुर लावै।
पाहन बेहोस कहँ ठाकुर खावै ॥
चेतन आतम बरम्ह सब के माहीं।
पावै परसाद देख दीदा जाई ॥
(तुलसी साहिब की शब्दावली, भाग 1, पृ. 18)
14. जो पाथर कउ कहते देव ॥ ता की बिरथा होवै सेव ॥
जो पाथर की पांई पाइ ॥ तिस की घाल अजांई जाइ ॥
गुरु अर्जुन देव (आदि ग्रन्थ, पृ. 1160)
15.मूरति घड़ी पषाण की, कीया सिरजनहार।
दादू साच सूझै नहीं, यूँ डूबा संसार ॥
(दादू दयाल की बानी, भाग 1, पृ. 123)
ਪੂਜਾ
ਆਤਮਾ ਦਾ ਪਰਮਾਤਮਾ ਵੱਲ ਕੁਦਰਤੀ ਝੁਕਾਅ ਹੈ ਜਿਸ ਕਾਰਨ ਹਰ ਇਨਸਾਨ ਦੇ ਅੰਦਰ ਪਰਮਾਤਮਾ ਨਾਲ ਮਿਲਨ ਦੀ ਕੁਦਰਤੀ ਤੜਪ ਹੈ ਅਤੇ ਹਰ ਇਨਸਾਨ ਕਿਸੇ ਨਾ ਕਿਸੇ ਢੰਗ ਨਾਲ ਉਹਦੀ ਪੂਜਾ ਜਾਂ ਭਗਤੀ ਕਰਨ ਦੀ ਕੋਸ਼ਸ਼ ਕਰਦਾ ਹੈ। ਸੰਤਾਂ-ਮਹਾਤਮਾਂ ਦਾ ਪੂਜਾ ਜਾਂ ਭਗਤੀ ਤੋਂ ਇੱਕੋ ਭਾਵ ਹੈ। ਭਗਤ, ਪੁਜਾਰੀ ਜਾਂ ਉਪਾਸਕ ਭਗਤੀ, ਪੂਜਾ ਜਾਂ ਉਪਾਸਨਾ ਦੁਆਰਾ ਆਪਣੇ ਇਸ਼ਟ ਦੀ ਪ੍ਰਸੰਨਤਾ ਅਤੇ ਉਸ ਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਦਾ ਯਤਨ ਕਰਦਾ ਹੈ।

ਸੰਸਾਰ ਵਿਚ ਪ੍ਰਾਚੀਨ ਕਾਲ ਤੋਂ ਹੀ ਅਨੇਕ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦੇ ਇਸ਼ਟਾਂ ਦੀ ਅਨੇਕ ਪ੍ਰਕਾਰ ਦੀ ਪੂਜਾ ਜਾਂ ਭਗਤੀ ਦੀ ਪਰੰਪਰਾ ਚੱਲੀ ਆ ਰਹੀ ਹੈ। ਲੋਕ ਕੁਦਰਤ ਦੀਆਂ ਸ਼ਕਤੀਆਂ ਜਿਵੇਂ ਸੂਰਜ ਦੇਵਤਾ, ਵਰੁਣ ਦੇਵਤਾ ਆਦਿ ਦੀ ਪੂਜਾ ਕਰਦੇ ਰਹੇ ਹਨ। ਦੇਵੀ-ਦੇਵਤਿਆਂ ਅਤੇ ਅਵਤਾਰਾਂ ਆਦਿ ਦੀ ਪੂਜਾ ਸਦੀਆਂ ਤੋਂ ਚੱਲੀ ਆ ਰਹੀ ਹੈ। ਕਈ ਲੋਕ ਪਸ਼ੂ-ਪੰਛੀਆਂ ਆਦਿ ਦੀ ਵੀ ਪੂਜਾ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਸੰਤਮਤ ਵਿਚ ਇਕ ਪਰਮਾਤਮਾ ਨੂੰ ਛੱਡ ਕੇ ਦੂਸਰੀ ਹਰ ਚੀਜ਼ ਨੂੰ ਅਧੂਰੀ ਅਤੇ ਨਾਸ਼ਵਾਨ ਮੰਨਿਆ ਗਿਆ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ ਸਭ ਧਰਮਾਂ ਵਿਚ ਸਮੇਂ-ਸਮੇਂ ਹੋਏ ਸਭ ਪੂਰਨ ਸੰਤਾਂ-ਮਹਾਤਮਾਂ ਨੇ ਸਿਰਫ਼ ਉਸ ਇਕ ਨਿਰਾਕਾਰ, ਅਮਰ-ਅਵਿਨਾਸ਼ੀ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਪੂਜਾ ਜਾਂ ਭਗਤੀ ਦਾ ਉਪਦੇਸ਼ ਦਿੱਤਾ ਹੈ। ਕਬੀਰ ਸਾਹਿਬ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ:
'ਪੂਜਹੁ ਰਾਮੁ ਏਕੁ ਹੀ ਦੇਵਾ।'
(ਆਦਿ ਗ੍ਰੰਥ, ਪੰ. 484)
ਜਿਸ ਇਸ਼ਟ ਦੀ ਅਸੀਂ ਪੂਜਾ ਕਰਦੇ ਹਾਂ, ਅਸੀਂ ਓਸੇ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦੇ ਹਾਂ। ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ:
'ਜੈਸਾ ਸੇਵੈ ਤੈਸੋ ਹੋਇ।।'
(ਆਦਿ ਗ੍ਰੰਥ, ਪੰ. 223)
ਭਗਵਾਨ ਕ੍ਰਿਸ਼ਨ ਨੇ ਵੀ ਗੀਤਾ ਵਿਚ ਉਪਦੇਸ਼ ਦਿੱਤਾ ਹੈ ਕਿ ਦੇਵੀ- ਦੇਵਤਿਆਂ ਦੀ ਪੂਜਾ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਦੇਵੀ-ਦੇਵਤਿਆਂ ਨੂੰ, ਜਿੰਨਾਂ-ਭੂਤਾਂ ਦੀ ਪੂਜਾ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਜਿੰਨਾਂ-ਭੂਤਾਂ ਨੂੰ ਅਤੇ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪਰਮੇਸ਼ਰ ਦੀ ਪੂਜਾ ਕਰਨ ਵਾਲੇ ਪਾਰਬ੍ਰਹਮ ਪਰਮੇਸ਼ਰ ਨੂੰ ਪ੍ਰਾਪਤ ਕਰਦੇ ਹਨ। (ਗੀਤਾ 9:25)

ਉਹ ਪ੍ਰਭੂ ਸਤਿ ਹੈ। ਉਹ ਸਕਤੀ-ਰੂਪ, ਗਿਆਨ-ਰੂਪ, ਪ੍ਰੇਮ-ਰੂਪ ਅਤੇ ਅਨੰਦ- ਰੂਪ ਹੈ। ਸਿਰਫ ਉਹਦੀ ਪੂਜਾ ਜਾਂ ਭਗਤੀ ਦੁਆਰਾ ਹੀ ਜੀਵਾਤਮਾ ਵੀ ਸਤਿ- ਰੂਪ, ਸ਼ਕਤੀ-ਰੂਪ, ਗਿਆਨ-ਰੂਪ, ਪ੍ਰੇਮ-ਰੂਪ ਅਤੇ ਅਨੰਦ-ਰੂਪ ਬਣ ਸਕਦੀ ਹੈ।
ਉਹ ਪਰਮਾਤਮਾ ਅਜਨਮਾ ਤੇ ਅਜੂਨੀ ਹੈ। ਉਹ ਜੰਮਣ-ਮਰਨ ਅਤੇ ਆਵਾਗਵਣ ਦੇ ਬੰਧਨਾਂ ਤੋਂ ਉੱਪਰ ਹੈ। ਬਾਕੀ ਸਭ ਇਸ਼ਟ ਆਵਾਗਵਣ ਦੇ ਚੱਕਰ ਨਾਲ ਬੱਝ ਹੋਏ ਹਨ, ਇਸ ਲਈ ਉਨ੍ਹਾਂ ਦੀ ਪੂਜਾ ਜਾਂ ਭਗਤੀ ਦੁਆਰਾ ਕਦੇ ਵੀ ਕੋਈ ਭਗਤ ਜਾਂ ਪੁਜਾਰੀ ਜੰਮਣ-ਮਰਨ ਦੇ ਬੰਧਨਾਂ ਤੋਂ ਮੁਕਤ ਨਹੀਂ ਹੋ ਸਕਦਾ।
ਸੰਤ-ਮਹਾਤਮਾਂ ਸਮਝਾਉਂਦੇ ਹਨ ਕਿ ਮਨੁੱਖ ਦੁਆਰਾ ਬਣਾਏ ਗਏ ਪੂਜਾ ਜਾਂ ਭਗਤੀ ਦੇ ਸਭ ਸਾਧਨ ਅਤੇ ਮਾਰਗ ਬਾਹਰਮੁਖੀ ਹਨ। ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੁਆਰਾ ਬਣਾਇਆ ਗਿਆ ਪੂਜਾ ਜਾਂ ਭਗਤੀ ਦਾ ਸਾਧਨ ਅਤੇ ਮਾਰਗ ਅੰਤਰਮੁਖੀ ਹੈ।
ਉਹ ਪਰਮਾਤਮਾ ਵੀ ਅੰਦਰ ਹੈ ਅਤੇ ਉਸ ਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਦਾ ਸਾਧਨ ਅਤੇ ਮਾਰਗ ਵੀ ਅੰਦਰ ਹੈ।

ਗੁਰੂ ਅਰਜਨ ਦੇਵ ਜੀ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ:
ਮਾਰਗੁ ਪ੍ਰਭ ਕਾ ਹਰਿ ਕੀਆ ਸੰਤਨ ਸੰਗਿ ਜਾਤਾ॥
(ਆਦਿ ਗ੍ਰੰਥ, ਪੰ. 1122)
ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਪੂਜਾ ਜਾਂ ਭਗਤੀ ਦਾ ਸੱਚਾ ਸਾਧਨ ਅਤੇ ਮਾਰਗ ਇਕ, ਅਨਾਦੀ ਅਤੇ ਪਰਿਵਰਤਨ ਰਹਿਤ ਹੈ। ਇਹ ਖ਼ੁਦ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੁਆਰਾ ਬਣਾਇਆ ਗਿਆ ਹੈ। ਇਸ ਦਾ ਗਿਆਨ ਆਪਣੀ ਆਤਮਾ ਨੂੰ ਪਰਮਾਤਮਾ ਵਿਚ ਅਭੇਦ ਕਰ ਚੁੱਕੇ ਪੂਰਨ ਸੰਤਾਂ ਦੁਆਰਾ ਹੁੰਦਾ ਹੈ। ਸਿਰਫ਼ ਇਸ ਸਾਧਨ ਅਤੇ ਮਾਰਗ ਨੂੰ ਅਪਣਾ ਕੇ ਹੀ ਇਨਸਾਨ ਪਰਮੇਸ਼ਰ ਨਾਲ ਮਿਲਾਪ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ।
ਸੰਤ-ਮਹਾਤਮਾਂ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੁਆਰਾ ਆਪਣੇ ਨਾਲ ਮਿਲਾਪ ਲਈ ਬਣਾਏ ਗਏ ਸਾਧਨ ਜਾਂ ਮਾਰਗ ਨੂੰ ਸੰਤਮਤ, ਗੁਰਮਤ, ਭਗਤੀ-ਮਾਰਗ, ਪ੍ਰੇਮਾ-ਭਗਤੀ ਦਾ ਮਾਰਗ ਆਦਿ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ ਅਤੇ ਬਾਕੀ ਹਰ ਕਿਸਮ ਦੀ ਪੂਜਾ ਜਾਂ ਭਗਤੀ ਨੂੰ ਮਨਮਤ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ। ਗੁਰੂ ਅਮਰ ਦਾਸ ਜੀ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ:
ਪੂਜਾ ਕਰੈ ਸਭੁ ਲੋਕੁ ਸੰਤਹੁ ਮਨਮੁਖਿ ਥਾਇ ਨ ਪਾਈ॥
ਪੂਜਾ ਕਰਹਿ ਪਰੁ ਬਿਧਿ ਨਹੀ ਜਾਣਹਿ ਦੂਜੈ ਭਾਇ ਮਲੁ ਲਾਈ॥
(ਆਦਿ ਗ੍ਰੰਥ, ਪੰ. 910)
ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਪੂਜਾ ਜਾਂ ਭਗਤੀ ਤਾਂ ਸਾਰੇ ਹੀ ਕਰਦੇ ਹਨ ਪਰ ਉਹ ਮਨਮਰਜ਼ੀ ਨਾਲ ਭਗਤੀ ਕਰਦੇ ਹਨ। ਸੱਚੀ ਭਗਤੀ ਦਾ ਗਿਆਨ ਨਾ ਹੋਣ ਕਾਰਨ ਉਨ੍ਹਾਂ ਨੂੰ ਉਸ ਭਗਤੀ ਵਿੱਚੋਂ ਲਾਭ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ, ਹਾਨੀ ਹੁੰਦੀ ਹੈ। ਆਪ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ:
ਹਰਿ ਸਾਚੇ ਭਾਵੈ ਸਾ ਪੂਜਾ ਹੋਵੈ ਭਾਣਾ ਮਨਿ ਵਸਾਈ ॥
(ਆਦਿ ਗ੍ਰੰਥ, ਪੰ. 910)
ਪੂਜਾ ਜਾਂ ਭਗਤੀ ਓਹੀ ਠੀਕ ਹੈ ਜਿਹੜੀ ਪਰਮਾਤਮਾ ਨੂੰ ਪਸੰਦ ਹੋਵੇ। ਇਸ ਲਈ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੇ ਭਾਣੇ ਜਾਂ ਹੁਕਮ ਨੂੰ ਮੰਨਦੇ ਹੋਏ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੁਆਰਾ ਖ਼ੁਦ ਨਿਰਧਾਰਤ ਕੀਤੀ ਗਈ ਸੱਚੀ ਪੂਜਾ ਜਾਂ ਭਗਤੀ ਵਿਚ ਲੱਗਣਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ। ਆਪ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ:
ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਹੋਰ ਪੂਜ ਨ ਹੋਵੀ ਭਰਮਿ ਭੁਲੀ ਲੋਕਾਈ॥
ਸਬਦਿ ਮਰੈ ਮਨੁ ਨਿਰਮਲੁ ਸੰਤਹੁ ਏਹ ਪੂਜਾ ਥਾਇ ਪਾਈ॥
(ਆਦਿ ਗ੍ਰੰਥ, ਪੰ. 910)
ਸਿਰਫ਼ ਸ਼ਬਦ ਜਾਂ ਨਾਮ ਦੀ ਕਮਾਈ ਹੀ ਉਹ ਸੱਚੀ ਪੂਜਾ ਜਾਂ ਭਗਤੀ ਹੈ ਜਿਹੜੀ ਪਰਮੇਸ਼ਰ ਨੂੰ ਪਸੰਦ ਹੈ ਅਤੇ ਇਸ ਦੁਆਰਾ ਹੀ ਜੀਵ ਪਰਮਾਤਮਾ ਨਾਲ ਮਿਲਾਪ ਕਰ ਸਕਦਾ ਹੈ। ਆਪ ਖ਼ਬਰਦਾਰ ਕਰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਸ਼ਬਦ ਜਾਂ ਨਾਮ ਦੀ ਕਮਾਈ ਨੂੰ ਛੱਡ ਕੇ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਪੂਜਾ ਜਾਂ ਭਗਤੀ ਦਾ ਜੋ ਵੀ ਸਾਧਨ ਜਾਂ ਮਾਰਗ ਅਸੀਂ ਅਪਣਾਉਂਦੇ ਹਾਂ, ਉਹ ਸਾਨੂੰ ਚੁਰਾਸੀ ਦੇ ਚੱਕਰ ਨਾਲ ਬੰਨ੍ਹ ਕੇ ਰੱਖਦਾ ਹੈ। ਅਜਿਹੇ ਮਨਮਰਜ਼ੀ ਦੇ ਸਾਧਨਾਂ ਦੁਆਰਾ ਅਸੀਂ ਕਦੇ ਵੀ ਪਰਮਾਤਮਾ ਨਾਲ ਮਿਲਾਪ ਨਹੀਂ ਕਰ ਸਕਦੇ।
ਜਪ-ਤਪ, ਤੀਰਥ-ਵਰਤ, ਪੁੰਨ-ਦਾਨ, ਅਨੇਕ ਕਿਸਮ ਦੇ ਹਠ-ਕਰਮਾਂ ਆਦਿ ਦਾ ਫਲ ਜ਼ਰੂਰ ਮਿਲਦਾ ਹੈ, ਪਰ ਪੂਜਾ ਜਾਂ ਭਗਤੀ ਦੇ ਇਹ ਸਾਧਨ ਪਰਮਾਤਮਾ ਨਾਲ ਮਿਲਾਪ ਦਾ ਕਾਰਨ ਨਹੀਂ ਬਣ ਸਕਦੇ। ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਦੇਵ ਜੀ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ:
ਸਗਲੇ ਕਰਮ ਧਰਮ ਸੁਚਿ ਸੰਜਮ ਜਪ ਤਪ ਤੀਰਥ ਸਬਦਿ ਵਸੇ॥
(ਆਦਿ ਗ੍ਰੰਥ, ਪੰ. 1332)
ਆਪ ਸਮਝਾਉਂਦੇ ਹਨ ਕਿ ਹਰ ਕਿਸਮ ਦੇ ਸ੍ਰੇਸ਼ਟ ਕਰਮਾਂ, ਹਰ ਕਿਸਮ ਦੇ ਧਾਰਮਿਕ ਯਤਨਾਂ, ਮਨ-ਇੰਦਰੀਆਂ ਦੀ ਸਫ਼ਾਈ ਦੇ ਲਈ ਅਪਣਾਏ ਜਾਣ ਵਾਲੇ ਹਰ ਕਿਸਮ ਦੇ ਸੰਜਮ ਅਤੇ ਹਰ ਕਿਸਮ ਦੇ ਜਪ, ਤਪ, ਤੀਰਥ ਆਦਿ ਦਾ ਫਲ ਨਾਮ ਦੀ ਕਮਾਈ ਵਿਚ ਸ਼ਾਮਲ ਹੈ। ਆਪ ਉਪਦੇਸ਼ ਦਿੰਦੇ ਹਨ:
ਪੂਜਾ ਕੀਚੈ ਨਾਮੁ ਧਿਆਈਐ ਬਿਨੁ ਨਾਵੈ ਪੂਜ ਨ ਹੋਇ॥
(ਆਦਿ ਗ੍ਰੰਥ, ਪੰ. 489)
ਆਪਣਾ ਧਿਆਨ ਨਾਮ ਨਾਲ ਜੋੜਨਾ ਹੀ ਸੱਚੀ ਪੂਜਾ ਹੈ। ਇਸ ਤੋਂ ਬਿਨਾਂ ਦੂਜੀ ਕੋਈ ਵੀ ਪੂਜਾ ਜਾਂ ਭਗਤੀ ਪਰਮਾਤਮਾ ਨਾਲ ਮਿਲਾਪ ਦਾ ਸਾਧਨ ਨਹੀਂ ਬਣ ਸਕਦੀ।

ਕੁਝ ਲੋਕ ਹਠ-ਮਾਰਗ ਦਾ ਪ੍ਰਚਾਰ ਕਰਦੇ ਹਨ, ਕੁਝ ਕਰਮ-ਮਾਰਗ ਦਾ ਅਤੇ ਕੁਝ ਗਿਆਨ-ਮਾਰਗ ਦਾ। ਕੁਝ ਲੋਕ ਤਿਆਗ ਉੱਤੇ ਜ਼ੋਰ ਦਿੰਦੇ ਹਨ ਤਾਂ ਕੁਝ ਹੋਰ ਭਗਤੀ ਦੇ ਦੂਸਰੇ ਦੁੱਖਦਾਈ ਬਾਹਰਮੁਖੀ ਸਾਧਨਾਂ ਦੀ ਵਕਾਲਤ ਕਰਦੇ ਹਨ।
ਇਹ ਸਾਧਨ ਅਤੇ ਮਾਰਗ ਆਮ ਲੋਕਾਂ ਦੇ ਵੱਸ ਦੀ ਗੱਲ ਨਹੀਂ ਹਨ। ਉਹ ਪ੍ਰਭੂ ਪਰਮ-ਦਇਆਲੂ ਹੈ। ਉਹਨੇ ਆਪਣੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਲਈ ਸਭ ਤੋਂ ਵੱਧ ਸੌਖਾ, ਸੁਭਾਵਿਕ ਅਤੇ ਸਹਿਜ ਮਾਰਗ ਬਣਾਇਆ ਹੈ।
ਉਹ ਮਾਰਗ ਸ਼ਬਦ ਜਾਂ ਨਾਮ ਹੈ। ਨਾਮ ਹਰ ਮਨੁੱਖ ਦੇ ਅੰਦਰ ਹੈ। ਇਹ ਹਰ ਮਨੁੱਖ ਦੇ ਨੇੜੇ ਤੋਂ ਨੇੜੇ ਹੈ। ਪ੍ਰਭੂ ਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਲਈ ਕਿਸੇ ਕਿਸਮ ਦੇ ਬਾਹਰਮੁਖੀ ਯਤਨ ਦੀ ਲੋੜ ਨਹੀਂ, ਸਿਰਫ਼ ਧਿਆਨ ਨੂੰ ਅੰਦਰ ਸ਼ਬਦ ਜਾਂ ਨਾਮ ਨਾਲ ਜੋੜਨ ਦੀ ਲੋੜ ਹੈ। ਨਾਮ ਤੋਂ ਸੰਤਾਂ- ਮਹਾਤਮਾਂ ਦਾ ਭਾਵ ਕਿਸੇ ਵਿਸ਼ੇਸ਼ ਭਾਸ਼ਾ ਦਾ ਕੋਈ ਲਫ਼ਜ਼ ਨਹੀਂ ਹੈ। ਨਾਮ ਤੋਂ ਸੰਤਾਂ ਦਾ ਭਾਵ ਉਹ ਸੱਚਾ ਸ਼ਬਦ ਹੈ ਜਿਸ ਨੇ ਸ੍ਰਿਸ਼ਟੀ ਦੀ ਰਚਨਾ ਪੈਦਾ ਕੀਤੀ ਹੈ ਅਤੇ ਜਿਹੜਾ ਹਰ ਵਿਅਕਤੀ ਦੇ ਅੰਦਰ ਅੱਖਾਂ ਤੋਂ ਉੱਪਰ ਅਤੇ ਵਿਚਕਾਰ ਦਿਨ-ਰਾਤ ਧੁਨਕਾਰਾਂ ਦੇ ਰਿਹਾ ਹੈ।

ਗੁਰੂ ਨਾਨਕ ਸਾਹਿਬ ਕਹਿੰਦੇ ਹਨ:
ਦੇਹੀ ਅੰਦਰਿ ਨਾਮੁ ਨਿਵਾਸੀ ॥ ਆਪੇ ਕਰਤਾ ਹੈ ਅਬਿਨਾਸੀ॥
(ਆਦਿ ਗ੍ਰੰਥ, ਪੰ. 1026)
ਘਰਿ ਘਰਿ ਨਾਮੁ ਨਿਰੰਜਨਾ ਸੋ ਠਾਕੁਰੁ ਮੇਰਾ ॥
(ਆਦਿ ਗ੍ਰੰਥ, ਪੰ. 229)
ਦੇਹੀ ਦੇ ਅੰਦਰ ਮਿਲਨ ਵਾਲਾ ਨਾਮ ਸੱਚਾ ਕਰਤਾ ਜਾਂ ਨਿਰੰਜਨ ਹੈ ਅਤੇ ਉਹੀ ਸੱਚਾ ਠਾਕੁਰ ਜਾਂ ਇਸ਼ਟ ਹੈ। ਆਪ ਸਮਝਾਉਣਾ ਚਾਹੁੰਦੇ ਹਨ ਕਿ ਨਾਮ ਦੁਆਰਾ ਹੀ ਪੂਜਾ ਕਰਨੀ ਹੈ ਅਤੇ ਨਾਮ ਦੀ ਹੀ ਪੂਜਾ ਕਰਨੀ ਹੈ। ਨਾਮ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦਾ ਰੂਪ ਹੈ ਅਤੇ ਨਾਮ ਨਾਲ ਲਿਵ ਜੋੜਨਾ ਹੀ ਪਰਮਾਤਮਾ ਨਾਲ ਲਿਵ ਜੋੜਨਾ ਹੈ। ਇਸ ਲਈ ਆਪਣੇ ਮਨ ਨੂੰ ਹਰ ਕਿਸਮ ਦੇ ਸਾਧਨਾਂ ਵਿੱਚੋਂ ਕੱਢ ਕੇ ਸਿਰਫ਼ ਨਾਮ ਜਾਂ ਸ਼ਬਦ ਦੀ ਪੂਜਾ ਦੁਆਰਾ ਪਰਮਾਤਮਾ ਦੀ ਪ੍ਰਾਪਤੀ ਦਾ ਯਤਨ ਕਰਨਾ ਚਾਹੀਦਾ ਹੈ।
ਬਾਣੀ
1. ਪਾਂਚ ਤੱਤ ਨਰ ਆਤਮ ਦੇਹੀ। ਏਕ ਤੱਤ ਪਾਹਨ ਕੋ ਸੇਈ॥
ਪਾਹਨ ਕੋ ਤੁਮ ਸੁਧ ਬਤਾਵੋ। ਚੇਤਨ ਕੋ ਧਰਿ ਦੋਸ਼ ਲਗਾਵੈ॥
-ਤੁਲਸੀ ਸਾਹਿਬ, ਘਟ ਰਾਮਾਇਣ, ਭਾਗ 2, ਪੰ. 66
2. ਆਤਮ ਤੇਜਿ ਪੂਜੇ ਜੜ ਪਾਹਨ ਪ੍ਰੇਮ ਸੋ ਮੂਰਤਿ ਹੈ ਘਟ ਮਾਹੀਂ॥
ਬੇਦ ਵਿਚਾਰਿ ਆਚਾਰਿ ਚਤੁਰਦਿਸ਼ ਖੋਜਤ ਹੈ ਈਹਈ ਸਬ ਆਹੀਂ॥
-ਦਰੀਆ, ਹਸਤਲਿਖਿਤ ਗ੍ਰੰਥ, ਪੰ. 20
3.ਏਕੈ ਪਾਥਰ ਕੀਜੈ ਭਾਉ॥ ਦੂਜੈ ਪਾਥਰ ਧਰੀਐ ਪਾਉ॥
ਜੇ ਓਹੁ ਦੇਉ ਤ ਓਹੁ ਭੀ ਦੇਵਾ॥ ਕਹਿ ਨਾਮਦੇਉ ਹਮ ਹਰਿ ਕੀ ਸੇਵਾ॥
-ਸੰਤ ਨਾਮਦੇਵ (ਆਦਿ ਗ੍ਰੰਥ, ਪੰ. 525)
4. ਘਰ ਮੇਂ ਜ਼ਿੰਦਾ ਛੋੜਿ ਕੈ ਮੁਰਦਾ ਪੂਜਨ ਜਾਇ॥
ਮੁਰਦਾ ਪੂਜਨ ਜਾਇ ਭੀਤਿ ਕੋ ਸਿਰਦਾ ਨਾਵੈਂ॥
ਪਾਨ ਫੂਲ ਔਰ ਖਾਂਡ ਜਾਇ ਕੈ ਤੁਰਤ ਚੜਾਵੈਂ ॥
ਤਾਲ ਕਿ ਮਾਟੀ ਆਨਿ ਊਂਚ ਕੈ ਬਾਂਧਿਨਿ ਚੌਰੀ।
ਲੀਪਿ ਪੋਤਿ ਕੇ ਧਰਿਨਿ ਪੂਰੀ ਔ ਬਰਾ ਕਚੌਰੀ॥
ਪੀਅਰ ਲੂਗਾ ਪਹਿਰਿ ਜਾਇ ਕੈ ਬੈਠਿਨਿ ਬੂੜਾ।
ਭਰਮਿ ਭਰਮਿ ਅਭੁਵਾਇ ਮਾਂਗਤ ਹੈਂ ਖੁਸੀ ਕੈ ਮੂੜਾ ॥
ਪਲਟੂ ਸਬ ਘਰ ਬਾਂਟਿ ਕੈ ਲੈ ਲੈ ਬੈਠੇ ਖਾਇ।
ਘਰ ਮੇਂ ਜਿੰਦਾ ਛੋੜਿ ਕੈ ਮੁਰਦਾ ਪੂਜਨ ਜਾਇ॥
-ਪਲਟੂ ਸਾਹਿਬ ਕੀ ਬਾਨੀ, ਭਾਗ 1, ਕੁੰਡਲੀ 190
5. ਪਾਤੀ ਤੋਰੈ ਮਾਲਿਨੀ ਪਾਤੀ ਪਾਤੀ ਜੀਉ ॥
ਜਿਸੁ ਪਾਹਨ ਕਉ ਪਾਤੀ ਤੋਰੈ ਸੋ ਪਾਹਨ ਨਿਰਜੀਉ॥
ਭੂਲੀ ਮਾਲਨੀ ਹੈ ਏਉ। ਸਤਿਗੁਰੁ ਜਾਗਤਾ ਹੈ ਦੇਉ ॥
ਬ੍ਰਹਮੁ ਪਾਤੀ ਬਿਸਨੁ ਡਾਰੀ ਫੂਲ ਸੰਕਰਦੇਉ॥
ਤੀਨਿ ਦੇਵ ਪ੍ਰਤਖਿ ਤੋਰਹਿ ਕਰਹਿ ਕਿਸ ਕੀ ਸੇਉ॥
-ਕਬੀਰ ਸਾਹਿਬ (ਆਦਿ ਗ੍ਰੰਥ, ਪੰ. 479)
6.ਬਾਹਰ ਮੂਰਤਿ ਪਥਲ ਕਾ ਰਚਿਆ ਤਾ ਪਰ ਪਾਤੀ ਦੀਨਾ।
ਸਜੀਵ ਤੋਰਿ ਨਿਰਜੀਵ ਕੇ ਪੂਜਾ ਜਬਰ ਸੇ ਭਏ ਅਧੀਨਾ॥
ਮਹਿਖਾ ਮਾਰਿ ਦੇਵਲ ਕੋ ਭੀਤਰ ਪਰ ਆਤਮ ਕਹੇ ਭੀਨਾ॥
ਜੀਵ ਸੀਵ ਇਹ ਰਾਮ ਸਭਨਿ ਮੇਂ ਭਾਨ ਕਲਾ ਛਬਿ ਦੀਨਾ॥
-ਦਰੀਆ ਗ੍ਰੰਥਾਵਲੀ, ਭਾਗ 1, ਪੰ. 102
7. ਆਨੀਲੇ ਫੂਲ ਪਰੋਈਲੇ ਮਾਲਾ ਠਾਕੁਰ ਕੀ ਹਉ ਪੂਜ ਕਰਉ॥
ਪਹਿਲੇ ਬਾਸੁ ਲਈ ਹੈ ਭਵਰਹ ਬੀਠਲ ਭੈਲਾ ਕਾਇ ਕਰਉ॥
ਆਨੀਲੇ ਦੂਧੁ ਰੀਧਾਈਲੇ ਖੀਰੰ ਠਾਕੁਰ ਕਉ ਨੈਵੇਦੁ ਕਰਉ॥
ਪਹਿਲੇ ਦੂਧੁ ਬਿਟਾਰਿਓ ਬਛਰੈ ਬੀਠਲੁ ਭੈਲਾ ਕਾਇ ਕਰਉ॥
-ਸੰਤ ਨਾਮਦੇਵ (ਆਦਿ ਗ੍ਰੰਥ, ਪੰ. 485)
8. ਮਾਟੀ ਕੇ ਕਰਿ ਦੇਵੀ ਦੇਵਾ ਤਿਸੁ ਆਗੈ ਜੀਉ ਦੇਹੀ॥
ਐਸੇ ਪਿਤਰ ਤੁਮਾਰੇ ਕਹੀਅਹਿ ਆਪਨ ਕਹਿਆ ਨ ਲੇਹੀ॥
ਸਰਜੀਉ ਕਾਟਹਿ ਨਿਰਜੀਉ ਪੂਜਹਿ ਅੰਤ ਕਾਲ ਕਉ ਭਾਰੀ ॥
ਰਾਮ ਨਾਮ ਕੀ ਗਤਿ ਨਹੀ ਜਾਨੀ ਭੈ ਡੂਬੇ ਸੰਸਾਰੀ॥
-ਕਬੀਰ ਸਾਹਿਬ (ਆਦਿ ਗ੍ਰੰਥ, ਪੰ. 332)
9. ਕਹਾ ਕਰੂੰ ਜਗ ਦੇਖਤ ਅੰਧਾ। ਤਜਿ ਆਨੰਦ ਬਿਚਾਰੈ ਧੰਧਾ॥
ਪਾਹਨ ਆਗੈ ਦੇਵ ਕਟੀਲਾ। ਬਾਕੋ ਪ੍ਰਾਂਣ ਨਹੀਂ ਬਾਕੀ ਪੂਜ ਰਚੀਲਾ ॥
ਨਿਰਜੀਵ ਆਗੈ ਸਰਜੀਵ ਮਾਰੈਂ। ਦੇਖਤ ਜਨਮ ਅਪਨੌ ਹਾਰੈ॥
ਆਂਗਣਿ ਦੇਵ ਪਿਛੋਕੜਿ ਪੂਜਾ। ਪਾਹਨ ਪੂਜ ਭਏ ਨਰ ਦੂਜਾ॥
ਨਾਮਦੇਵ ਕਹੈ ਸੁਨੋ ਰੇ ਧਗੜਾ। ਆਤਮਦੇਵ ਨ ਪੂਜੌ ਦਗੜਾ॥
-ਨਾਮਦੇਵ, ਹਿੰਦੀ ਪਦਾਵਲੀ, ਪਦ 47, ਪੰ. 19
10. ਨਾ ਕਛੁ ਬੋਲੇ ਨਾ ਕਛੁ ਖਾਈ। ਕਹੂ ਤੇਹੀ ਪੂਜੇ ਕਾ ਮਿਲੇ ਭਾਈ।
-ਦਰੀਆ ਸਾਗਰ, ਪੰ. 46
11.ਪਾਹਨ ਪੂਜੇ ਹਰਿ ਮਿਲੈ, ਤੌ ਮੈਂ ਪੂਜੂੰ ਪਹਾਰ।
ਤਾ ਤੋਂ ਯਹ ਚਾਕੀ ਭਲੀ, ਪੀਸਿ ਖਾਇ ਸੰਸਾਰ॥
-ਕਬੀਰ ਸਾਖੀ-ਸੰਗ੍ਰਹਿ, ਪੰ. 165
12. ਰਾਜ ਤੇ ਕੀਟ ਕੀਟ ਤੇ ਸੁਰਪਤਿ ਕਰਿ ਦੋਖ ਜਠਰ ਕਉ ਭਰਤੇ॥
ਕ੍ਰਿਪਾ ਨਿਧਿ ਛੋਡਿ ਆਨ ਕਉ ਪੂਜਹਿ ਆਤਮ ਘਾਤੀ ਹਰਤੇ॥
-ਗੁਰੂ ਅਰਜਨ ਦੇਵ (ਆਦਿ ਗ੍ਰੰਥ, ਪੰ. 1267)
13. ਕਰ ਕਰ ਪਰਸਾਦ ਭੋਗ ਠਾਕੁਰ ਲਾਵੈ।
ਪਾਹਨ ਬੇਹੋਸ ਕਹੂੰ ਠਾਕੁਰ ਖਾਵੈ॥
ਚੇਤਨ ਆਤਮ ਬਰਮਹ ਸਬ ਕੇ ਮਾਹੀਂ।
ਪਾਵੈ ਪ੍ਰਸਾਦ ਦੇਖ ਦੀਦਾ ਜਾਈ॥
-ਤੁਲਸੀ ਸਾਹਿਬ ਕੀ ਸ਼ਬਦਾਵਲੀ, ਭਾਗ 1, ਪੰ. 18
14. ਜੋ ਪਾਥਰ ਕਉ ਕਹਤੇ ਦੇਵ ॥ ਤਾ ਕੀ ਬਿਰਥਾ ਹੋਵੈ ਸੇਵ ॥
ਜੋ ਪਾਥਰ ਕੀ ਪਾਂਈ ਪਾਇ॥ ਤਿਸ ਕੀ ਘਾਲ ਅਜਾਂਈ ਜਾਇ ॥
ਗੁਰੂ ਅਰਜਨ ਦੇਵ (ਆਦਿ ਗ੍ਰੰਥ, ਪੰ.1160)
15.ਮੂਰਤਿ ਘੜੀ ਪਸ਼ਾਣ ਕੀ, ਕੀਆ ਸਿਰਜਨਹਾਰ।
ਦਾਦੂ ਸਾਚ ਸੂਝੈ ਨਹੀਂ, ਯੂੰ ਡੂਬਾ ਸੰਸਾਰ॥